सोमवार, 6 अप्रैल 2009

उपवास(लंघन) का महत्व

लंघन आंतरिक शुद्धि का सर्वोत्तम साधन है।विरेचन, पसीना, और एनिमा शरीर की शुद्धि की क्रियाएं भीतर का मल निकल देने वाली है ।किन्तु लंघन (उपवास) इन सबसे भिन्न है। लंघन का अर्थ यह है कि आवश्यकता और बलाबल के विचार से दो चार दिन खाने को ना लिया जाए , जिससे जठाराग्नि भीतर के उस सम्पुर्ण मल को भस्म कर डाले , जो रोग का कारण हो रहा है । पेट को नित्य भरते रहना और पाचक चुर्णॊं तथा औषधियों द्वारा मलों को पचाने की आपेक्षा , यह अचछा है कि पेट को कुछ आराम दिया जाए।

उपवास करने की विधि अत्यंत सरल है , आरम्भ मे अपने स्वभाव के कारण खाने का समय आने पर पेट खाने को मांगता है ,किन्तु कुछ समय ऎसा कष्ट होता है । तत्पश्च्यात कोइ दूखः नही जान पडता ।जो मोटे ताजे हो या जिनके शरीर पर चर्बी कि अधिकता हो उनके लिये ४-५ दिन उपवास करना कठिन नही। आरम्भ मे कुछ समय पर प्यास लगने पर मात्र जल पीना चाहिये । उसके बाद भुख लगने पर वेजीटेबल सूप लेना चाहिये। तत्पश्यात कुछ दिन तक दही का नुचडा पानी , फ़िर दुध ।

इस प्रकार शरीर के सम्पुर्ण मल और विषैले पदार्थ भस्म होकर शरीर मे नई शक्ति , स्फ़ूर्ति,नया रक्त , और नव-जीवन प्राप्त होता है।

उपवास समाप्त काने के कुछ दिन पीछे तक दलिया, थोडा घी पडी हुई खिचडी, शाक-भाजी, और दुध-दही का सेवन करना चाहिये। फ़िर नित्य का भोजन करने लगें।

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