सोमवार, 6 जुलाई 2009

हृदय रोग ( all types of heart diseases)

कारण- निरन्तर अत्यधिक ऊष्ण ( मदिरा, अमिष भोजन, मसाले दार तला हुआ भोजन), या अत्यधिक गुरु( भारी खाना, अधिक खाना,) श्रम, आघात, अध्यशयन( बार-बार खाना) , अधिक चिन्तन करने से , तथा अधारणीय वेगो(Natural Urges ) के धारण करने से पांच प्रकार का हृदय रोग उत्पन्न होता है ।


अपने कारणो से प्रकुपित हुए वातादि दोष रस को दुषित करके ( रस हृदय का आधार होता है ) हृदय मे सिथत होकर उसमे विकार उत्पन्न कर के हृदय रोगो की उत्पत्ति करते है ।
रस अपने शरीर की प्रथम धातु है , इसका सीधा सम्बन्ध अपने आहर से है , आहार से सर्वप्रथम रस की ही उत्पत्ति होतीहै , अत: हृदय रोग मुख्य रुप से खान पान मे मिथ्यायोग के कारण होता है । तो आहार मे बदलाव लाना बहुत ही जरुरी है ।
सभी प्रकार के हृदय रोगों मे दुध, दही , गुड , और घी, आदि वस्तुओं को छोड देना चाहिये।
जौ के सत्तु हदय रोग मे बहुत ही पथ्य होते है ।
सभी प्रकार के हृदय रोगों मे सामान्य आयुर्वेदिक चिकित्सा----पुष्करादि क्वाथ-- पुष्करमुल, बीजपुर मुल, प्लाश त्वक, पूतीक, कर्चूर, नागबला और देवदारू सभी समान मात्रा मे लेकर यथा विधि क्वाथ बना लेते है २० से २५ मि. लि. कि मात्रा मे सुबह शाम लेते है , और साथ मे प्रभाकर वटी १ और अर्जुनत्वक्घन वटी २ क्वाथ के साथ लेते है
योग तीन महीने बाद अपना असर दिखाता है ।

कोई टिप्पणी नहीं: